Home News Hathras case ki important Hidden Information| हाथरस केस की जरूरी बातें

Hathras case ki important Hidden Information| हाथरस केस की जरूरी बातें

दोस्तों आज हम हाथरस केस के बारे में बात करेंगे Hathras case में पुलिस की किस तरह से लापरवाही करी गई और किस को बदलने की कोशिश करी गई। सरकार ने भी कोई कठोर कदम नहीं उठाए बल्कि केस को दबाने की कोशिश करी गई। दोस्तों यह ब्लॉग कुछ ऐसी ही जानकारी आपके सामने लाना है जो शायद आपको पता नहीं है लेकिन आपको यह जानना बहुत ही आवश्यक है की सरकार और प्रशासन किस तरह की अपनी गंदी राजनीति के चलते कैसी कैसी हरकतें कर सकता है।

Hathras-case

हाथरस केस एक दर्दनाक और दुखद घटना-

दोस्तों आप सब को पता है कि हाथरस की किस घटना में पीड़िता की मौत हुई है। इससे बड़ा देश का सच कुछ और नहीं हो सकता। पीडिता ने मरने से ठीक पहले गैंगरेप करने वालों के नाम भी बताए हैं। यह बयान मृत्यु से ठीक पहले का है जिस पर शक करने का अधिकार कानूनी तौर से भी किसी को भी नहीं है, पुलिस को भी नहीं।
हाथरस के गैंगरेप-मर्डर में योगी सरकार पीड़ित पक्ष के ही विरूध हुई दिख रही है। नार्को टेस्ट करने का फैसला बड़ा, मजबूत और ताजातरीन उदाहरण है। दोनों पक्षों का नार्को टेस्ट बिलकुल ही समझ से बाहर है। नार्को टेस्ट होता है कि झूठ को पकड़ा जा सके। हाथरस की घटना में पीड़िता की मौत हो गई है इससे बड़ा सच कुछ और क्या हो सकता है। मरने से पहले पीड़िता ने अपराध करने वालों के नाम तक बताए हैं। और ऐसे में पीड़ित पक्ष का नार्को टेस्ट करवाना यह बताता है कि प्रशासन का शक आरोपी पक्ष से कहीं ज्यादा पीड़िता पक्ष पर है। ऐसे कई उदाहरण हैं जो योगी सरकार और उनके प्रशासन को पीड़िता के खिलाफ खड़ा होना दिखाते हैं।

हाथरस में मीडिया पर भी लगाइ पाबंदी-

दोस्तों पूरे हाथरस एरिया को पुलिस की निगरानी में बदल दिया गया। यहां तक मीडिया तक के प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई। 3 सितंबर को बात करने की परमिशन दी गई लेकिन इससे पहले बिल्कुल कर्फ्यू जैसे हालात में उस एसआईटी कमेटी ने जांच करें जिसका गठन 30 सितंबर को खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने करा था। लेकिन यह जांच भी किस तरह की थी यह भी जानना जरूरी है आप लोगों के लिए।

पीड़िता के परिवार को समाज से बिल्कुल अलग रखा गया। उनके मोबाइल फोन भी जमा करा लिए गए। देर रात तक पत्रकारों समेत किसी भी आदमी को उनसे मिलने नहीं दिया गया। यहां तक की महिला पत्रकारों को भी आगे नहीं जाने दिया गया। यह सब प्रतिबंधिता नहीं थी बल्कि एक तरह की जबरदस्ती थी पुलिस वालों की। बदतमीजी और न्यूज़ रिपोर्टर को रिपोर्टिंग नहीं करने दिया गया। यह सारी बातें यह यह संकेत बिल्कुल भी नहीं दे रही थी कि प्रशासन उस पीड़िता के परिवार वालों के साथ न्याय भी करना चाहती हैं।

क्यों नहीं हुआ श्मशान घाट में अंतिम संस्कार

योगी सरकार का चेहरा और भी गंदा नजर आया जब पीड़िता के शव को रातों-रात हाथरस ले जाया गया। लेकिन उसका अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया। उसकी मां की विनती भी विफल कर दी गई। वह अपनी बेटी का चेहरा आखरी बार देखना चाहती थी। पूरे परिवार को उसके घर में बंदी की तरह बंद किया गया और बाहर पुलिस का भारी पहरा लगवा दिया गया।

शव को पता नहीं किस ज्वलनशील पदार्थ से आग दी गई इसे किसी भी तरह से यह किसी भी दृष्टि से अंतिम संस्कार नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह मामला अब तक मीडिया में छा चुका था लेकिन इन सारी बातों से साफ पता चलता है कि लिहाजा रात 2:00 बजे शव को जलाने का फैसला पुलिस या स्थानीय प्रशासन का तो नहीं ही हो सकता।

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सरकार के रुख से और भी हैरानी-

दोस्तों अलीगढ़ के एक अस्पताल में पीड़िता का 13 दिन से इलाज चल रहा था। पुलिस ने काफी देर से सही लेकिन लड़की का बयान लिया। लड़की ने खुद गैंगरेप की बात बताइ और उन अपराधियों के नाम भी लिए। यह सब ऑन रिकॉर्ड है।

सिर्फ छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार अपराधियों पर आखिरकार पुलिस को गैंगरेप की धारा लगानी ही पड़ी। मगर आश्चर्य की बात यह है जिस अस्पताल में पीड़िता का इलाज चल रहा था उसी अस्पताल के एक न्यूरो सर्जन जिन की निगरानी में पीड़िता भी थी उनका बयान आता है कि गैंगरेप की खबर उन्हें है ही नहीं।
फिर पीड़िता के परिवार जनों ने लगातार ब्लीडिंग होने की बात कह रहे थे। लेकिन किसी ने उनकी बातों पर ध्यान तक नहीं दिया। पीड़िता की हालत बिगड़ती चली गई और जिसके कारण बहुत बड़ा हादसा बन गया। उसके बाद पीड़िता को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल रेफर किया गया तभी भी प्रशासन या सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली और नतीजा पीड़िता नहीं बची।

सबसे बड़ी आश्चर्य की बात तो यह है कि गैंगरेप जैसे केस में भी सिर्फ छेड़छाड़ का केस दर्ज हुआ उस पीड़िता के बयान को दर्ज करने की जरूरत कि नहीं समझी गयी। जब मामला मीडिया तक पहुंचा और जब यह मामला सुर्खियां में आ गया तब जाकर 22 सितंबर को गैंग रेप का केस दर्ज हुआ। इस दौरान उसके घर वाले कहते रहे की बच्ची बिना कपड़ों की मिली है, उसकी जीभ तक कटी थी, वह बोल भी नहीं पा रही थी, चलने लायक भी नहीं थी मगर पुलिस ने कोई ध्यान नहीं दिया। आरोपियों की गिरफ्तारी भी तुरंत नहीं करी गई और धाराएं तो बाद में ही लगाई गई।

नारको टेस्ट एक प्रकार से अन्याय है पीड़िता के परिवार के लिए-

इस कठिन और दुख पूर्ण परिस्थितियों में यहां तक भी प्रशासन की तरफ से कोई सही कदम नहीं उठाए गए। बल्कि अचानक से पुलिस और प्रशासन की तरफ से बयान आने लगे की लड़की के साथ बलात्कार हुआ ही नहीं है। फिर तो सबसे आश्चर्य करने वाली बात यह थी यानी मरते समय जो युवती ने बयान दिया था वह इस प्रकार से झूठलाया जा सकता है।

आपको बता दें एक बार किसी भी पीड़ित का बयान हो जाने के बाद उस पर फैसला सिर्फ कोर्ट कर सकता है। मगर यहां तो सरकार, प्रशासन, पुलिस और मीडिया सब के अपने अलग ही बयानबाजी चल रही थी और यह बयान झूठलाया दिया गया। पुलिस की निगरानी में नारको टेस्ट होगा और एक तरह का यह अन्याय भी है।

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दोस्तों अगर आपको भी या नारकोटेस्ट पीडिता के परिवार के लिए अन्याय लगता है तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों को शेयर करें और इस केस के बारे में आपकी क्या राय है यह कमेंट में जरूर बताएं।

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