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what is Electoral Bond and its interesting fact चुनावी बांड

हैलो दोस्तों आज हम बात करेंगे चुनावी बांड के बारे में। अक्सर हम सब चुनावी बांड (electoral bond) का नाम सुनते हैं।  क्या हमें पता है कि यह चुनावी बांड होते क्या है? यह काम कैसे करते हैं? और इसे खरीदा कैसे जा सकता है? और इसके कुछ तथ्यों के बारे में बात करते हैं। इन्हीं सब चीजों के बारे में इस ब्लॉग में हम सब जानेंगे।

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भारत की केंद्र सरकार ने देश के सारे राजनीतिक दलों के लिए चुनावी चंदे के अंदर पारदर्शिता लाने के लिए वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान बजट के अंदर चुनावी बांड शुरू करने की घोषणा की गई थी। 2018 के जनवरी में लोकसभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि चुनावी बांड(electoral bond) के नियमों को पूर्ण रुप दिया जा चुका है।

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परिभाषा:-

चुनावी बांड (electoral bonds) का मतलब एक ऐसे पेपर से होता है जिसके ऊपर करेंसी नोट की तरह उसकी कीमत यानी उसका मूल्य लिखा होता है। ऐसे बांड किसी व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों के द्वारा किसी राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह चुनावी बांड 1हजार, 10 हजार,1 लाख,10 लाख और 1 करोड रुपए के मूल्यों में उपलब्ध होते हैं। इसे किसी भी राजनीतिक दलों में मिलने वाले पैसे या चंदे की प्रक्रिया में पारदर्शिता होने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन बताया गया है।

2017 से पहले चुनावी बांड (electoral bonds) के नियम:-

2017 में बजट से पूर्व इसके नियम यह थे कि जब किसी भी पार्टी को ₹20000 या इससे कम पैसे चंदा के रूप में मिलता था तो उस पार्टी को उस चंदे का स्रोत बताने की जरूरत नहीं होती थी। इसी नियम का फायदा उठाकर राजनीतिक पार्टी चाहे उन्हें जो भी पैसा जितना भी मिला हो उसे वह 20000 या उससे कम बता देते थे जिससे उन्हें उसका स्रोत बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। इसी कारण राजनीतिक पार्टी केवल 10% पैसा ही सही बताती थी। बाकी 80-90% पैसे का स्रोत ही नहीं बताती थी और यह काला धन अपनी जीत के लिए इस्तेमाल करती थी। इसलिए चुनाव आयोग की सिफारिश पर 2017 में बजट में सरकार ने बेनामी चंदे की सीमा को घटाकर ₹2000 कर दिया। मतलब अब 2017 के बाद राजनीतिक दलों को ₹2000 से ऊपर के चंदे का स्रोत बताना पड़ेगा।

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चुनावी बांड (electoral bond) की रोचक बातें:-

कोई भी भारतीय नागरिक, संस्था या संगठन चुनावी बांड खरीद सकता है चंदा देने के लिए।

  1. चुनावी बांड 1हजार, 10 हजार,1 लाख,10 लाख और 1 करोड के मूल्य के होंगे।
  2. चंदा देने वाला किसी भी चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड पार्टी को चंदा दे सकता है।
  3. बांड खरीदने के लिए अपनी सारी जानकारी बैंक को देनी होगी।
  4. चुनावी बांड खरीदने वाले की जानकारी गुप्त रखी जाएगी।
  5. इन बांड पर बैंक द्वारा कोई भी ब्याज नहीं मिलेगा।
  6. इन बांड को केवल SBI के ही शाखाओं में खरीदा जा सकेगा।
  7. इन बॉन्ड्स को जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में ही खरीदा जा सकता है।
  8. बांड्स खरीदे जाने के बाद 15 दिन तक मान्य होते हैं।
  9. राजनीतिक पार्टियों को चुनाव आयोग को बताना होगा कि कितना धन बांड से मिला है।

निष्कर्ष:-

अतः यह सब जानने के बाद यह कहा जा सकता है कि चुनावी बांड के जरिए भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। लेकिन कौन पार्टी किससे और कहां से पैसा ले रही है यह पता चल सकता है। लेकिन लोगों का कहना है की बांड खरीदे जाने वालों की जानकारी गुप्त रखी जाएगी तो यह बांड अपने लक्ष्य को कामयाब नहीं कर पाएगा और हाल ही में चुनावी बांड का घोटाला करने का आरोप भी है बीजेपी पार्टी पर।

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